कठघरे में मनुष्यता

कुछ दिनों से विद्यालयों में 
शांति और अहिंसा के विशेष पाठ पढ़ाये जा रहे हैं

कुछ दिनों से कार्यालयों में 
आतंकवाद और विभाजनकारी शक्तियों के खिलाफ़
खड़े रहने की शपथें दिलायी जा रही हैं

कुछ दिनों से मेरे प्यारे देश का 
धार्मिक तापमान चरम पर है

कुछ दिनों से कस्बों से लेकर शहरों तक
शांति और सौहार्द्र बनाये रखने के लिए
बैठकें शुरू हो गई हैं

कुछ दिनों से कबीर के पद 
“मोकों कहाँ ढूँढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास हूँ
ना मैं देवल, ना मैं मस्जिद, न काबा कैलास हूँ” पढ़कर
कुहुक-कुहुक कर रो रहा हूँ

कुछ दिनों से मन उदास है
डर ने घेर लिया है

यह कैसा निर्दय काल है
बुद्ध हों या गांधी
जीसस हों या कबीर
नानक हों या मुहम्मद
सभी कटघरे में खड़े हैं

और मैं उनकी रिहाई से ना-उम्मीद
बियावान में सिर धुन रहा हूँ


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