
उनको आज याद करने की कोई योजना नहीं थी लेकिन अचानक याद आ गए. मुझे इस बात की तसल्ली है कि मैं बड़े लोगों के सानिध्य में नहीं पला-बढ़ा. मेरे आसपास ऐसे लोग रहे जिनके पैर कीचड़ से सने होते थे. वे धूल-धूसरित पैर बेंच पर रखकर बैठ जाते थे. थोड़ी कोफ़्त होती थी लेकिन उनके आने का इन्तजार बना रहता था. उनके जाने के बाद मैं बेंच को कपड़े से झाड़ कर या कभी-कभार पानी से धोकर साफ़ कर देता. ऐसा मत समझिएगा कि मेरी भावना बेंच को पवित्र करने की थी. मैं यह सब सफाई के लिए करता था. अभाव अपनी जगह लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से भी अधिकतम सफाई रखी जा सकती है. पूर्वजों के पास एक जोड़ी धोती होती थी लेकिन उसे वे करीने से साफ़-सुथरा रखते थे. इस्त्री कम ही लोग करा पाते थे. लोगों के पास आलमीरा या हैंगर नहीं होते थे. वे अपने कपड़े को चौपेत कर बिछावन के नीचे रख देते थे. एक जोड़ी जूते से पूरे गाँव के लड़के का विवाह हो जाता था. जब मेरा विवाह हुआ तो ससुर जी ने मुझे भी एक जोड़ी जूते दिए थे. जूते भी दहेज़ का हिस्सा होते थे. खैर मैं अपने विवाह का दिलचस्प किस्सा कभी बाद में सुनाऊंगा. पहले धनेसर भाई के विवाह का किस्सा सुनिए यह मेरे विवाह के किस्से से कहीं अधिक दिलचस्प है. मैंने यह किस्सा उनकी ज़ुबानी सुनी है. बहरहाल, उस समय लोग अव्यवस्था में भी भरसक व्यवस्थित रहने की कोशिश करते थे. जो जीवन उन्हें मिला था उसे वे बचाने और बेहतर बनाने की कोशिश में लगे रहते थे. थोड़ी-बहुत बेईमानी भी कर लेते लेकिन आँखों में हया बची थी. आजकल वाली स्थिति नहीं है कि अरबों रुपये का घोटालेबाज मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में ईमानदारी और नैतिकता पर लम्बा-चौड़ा भाषण पिला कर चला जाता है और हम हैं कि हर वाक्य पर ताली पीट-पीट कर हथेली लाल कर लेते हैं.
धनेसर भाई ने जब अपने विवाह का किस्सा सुनाया था,उस समय मैं सात-आठ साल का बालक था. हरि-कृपा से मेरी स्मृति तेज है. खासकर प्यार-मोहब्बत वाली बातें बिना कोई भूल-चूक मेरा हृदय रिकार्ड कर लेता है. मस्तिष्क भले ही शरीर में सर्वोपरि है लेकिन प्रेम का सिग्नल हृदय-प्रदेश में ही मिलता है. प्रेम की बात कलेजे पर हथेली रखकर की जाती है. सर तो प्रेम में झुकता है. प्रेम के सामने जो नतमस्तक नहीं होता उसे मनुष्य नहीं माना जाना चाहिए. खैर,यहाँ बात विवाह की हो रही है. विवाह इतना आसान काम नहीं है. यह बड़ा चैलेंजिंग जॉब है. आज की पीढ़ी भले आसान समझ ले लेकिन आज से साठ- सतर साल पहले लड़के अगुआ का बाट जोहते रहते थे. लगन के समय में अगुए की चांदी होती थी. दो-तीन धाकड़ ,बुजुर्ग लोग झोला-झंटा लेकर सप्ताह भर के लिए निकलते थे. उस समय आवागमन का मुख्य साधन साइकिल ही था. लोग साइकिल पर पीछे रजाई या कम्बल बाँध कर अगुअई करने जाते थे. एक सप्ताह उन्हें अच्छा खाना-पीना मिलता था. अन्य पहलुओं के अलावा खान-पान के आधार पर भी वे कुलीनता की परख करते थे. बहुत सारे लड़के का विवाह तो इसलिए सेटल हो पाता था कि उसका पिता सरकारी नौकरी में होते थे या उसके माथ पर दस बीघा जमीन है. लड़का बेरोजगार है तो भी चल जाता था. कुछ लड़के तो कॉलेज इसलिए पकड़े रहते थे कि विवाह हो जाए . बहुत से लड़के विवाह के बाद कॉलेज जाना छोड़ देते थे. मेरा रिजल्ट जब बी .ए. में एक पेपर इन्कम्प्लीट होने के कारण रुक गया तो पूरे गाँव में अफवाह फैलाई गयी कि मैं विवाह के लिए पढ़ाई करता था. अब किताब पढ़ेगा कि मेहरारू का मुंह देखेगा. खैर, कुछ अपवाद किस्म के लड़के थे जो वैवाहिक जीवन और पढ़ाई में संतुलन बिठाते हुए दोनों मोर्चों पर सफल दीखते थे. बावजूद इसके विवाह एक चुनौती तो था ही. बेटी कुंवारी नहीं रहती लेकिन लड़के कुंवारे रह जाते हैं. लोग के मुंह को कौन बंद कर सकता है? विवाहित जवान तो स्वयं को वरदान-प्राप्त मानते थे. जैसे विवाहित लड़कियां अपने अहिवात होने पर गर्व करती है,वैसे ही विवाहित लड़के मूंछ ऐंठ कर चलते थे. कुछ का विवाह तो मूंछ आने के पहले ही हो जाता था. जो प्रतीक्षा -सूची में रहते थे साल भर तक उनकी यात्रा बहुत कष्टदायक होती थी. लगन बीत जाने पर लोग दबी जुबान से या कभी खुलेआम उनका मजाक उड़ाते थे कि इस साल भी हाड़ में हरदी नहीं लगा. मैंने जब होश संभाला तो सुना कि मेरे पड़ोसी जयचंद जी अपने विवाह के लिए नियमित रूप से वृहस्पतिवार का व्रत करते थे और पीला अन्न ग्रहण करते थे. केले के पेड़ में जल देते थे. अब समझ सकते हैं कि विवाह के लिए कितनी बड़ी तपस्या करनी पड़ती थी.
उपर्युक्त स्थितियों के मद्देनजर धनेसर भाई जवानी के बार्डर को क्रॉस करना नहीं चाहते थे. वे देख रहे थे कि उनसे दो बड़े भाइयों के विवाह की उम्र समाप्त हो चुकी थी. उनकी चिंता और भी बढ़ जाती थे जब वह देखते थे पांच भाइयों में से मात्र एक भाई की शादी हुई थी . शेष लोग की आँखें अगुआ का बाट जोहते-जोहते पथरा गयी थी.यह सब मैं उस समय के हिसाब से कह रहा हूँ. आज तो विवाह के लिए कोई एज लिमिट नहीं है. दिल है कब दरिया बन जाए और कब इसमें तूफ़ान आ जाए कौन जानता है? यह ऐसा समय है कि लाइफ में कुछ भी हो सकता है. धनेसर भाई सही समय पर सतर्क हो गए. श्रीमान, श्रीमती की खोज में पूरब के देश चले गए. जहाँ रुके ,कुछ दिनों में रोजी-रोजगार का साधन ढूँढा. फिर जेब में कुछ सिक्के हुए, सिक्के जब खनकने लगे तो हृदय की वीणा का तार भी बज उठा. अब यह वीणा कभी भी बज उठती. कभी-कभी तो सुर बिगड़ता तो शोर करने लगती. लाख साइलेंट मोड में रखें,वाईब्रेशन तो रोक नहीं सकते. पड़ोसी भी चौकस हो जाता. दिल की बात दीवार फांदने लगी. भगवान् सब का दिन लौटाते हैं. एक सहायक मिल गया और गुरु सुआ की तरह उसने प्रेम का पंथ दिखाया. यहाँ ज्यादा संघर्ष नहीं था. लड़की के माता-पिता गरीब थे. बड़ा भाई इतना ही कमा पाता था कि शाम का चूल्हा जल सके. लिहाजा, लड़की की इच्छा जानने की जरूरत महसूस नहीं की गयी. धनेसर भाई को और क्या चाहिए था- अंधा पाए दो आँख. मिलन की उत्सुकता इतनी बढ़ गयी कि एक दिन डेढ़ सौ किलोमीटर साइकिल चलाकर कन्या को देखने के लिए पहुँच गए. पहली ही नजर में दिल हार गए. कन्या तो सुकन्या थी. भाषा की समस्या थी. वह हिंदी जानती नहीं थी और जनाब असमिया बोलने में हकलाते थे. लेकिन दिल की भाषा तो लाजवाब होती है. यहाँ तो आँखों की भाषा होती है. मौन की भाषा होती है. पैरों की चाल की अलहदा भाषा होती है. यहाँ तक कि मौन की भी भाषा होती है. गजब कि इस भाषा की कोई लिपि नहीं होती,कोई व्याकरण नहीं होता. एक चुप होता है तो दूसरा सुनता है. दो दिल ही ठीक-ठीक इस भाषा का इन्टरप्रेटेशन करते हैं. यह कोड लैंग्वेज है. इसको जो डिकोड करे वही न प्रेमी है! प्रेम में समझ होती है .जहाँ समझाना पड़े वहां प्रेम नहीं है. खैर,यहाँ प्रेम वाला मामला कम था. जरूरत वाला था-जैसे दाल-रोटी. खैर, धनेसर भाई जब उस रात लौटे तो थकान से बुखार चढ़ गया. नींद गहरी आयी और सपने भी खूब आये. दूसरे दिन वे काम पर नहीं गए. उनका सबसे बड़ा काम तो हो गया था. नहा-धोकर पवित्र मन से एक किलो लड्डू खरीदा और हनुमानजी को सुपुर्द कर आये. अगले कुछ महीने जतन से पैसा बचाया. योजनाएं बनाई. कुछ कपड़े-गहने खरीदे. एक दिन शिव-पार्वती को साक्षी बनाकर बन्धनग्रस्त हो गए. फिर, चिंतामुक्त होकर कनिया को लेकर रेलगाड़ी में सवार हुए और गंगा किनारे वाले अपने गाँव आ गए. उनकी खुशी संभाले नहीं संभल रही थी. पांव तो धरती पर पड़ ही नहीं रहे थे. लग रहा था कि विश्वयुद्ध जीत कर आ रहे हों. वह गलत नहीं थे. सचमुच दो से दुनिया बसती है. अकेला चना भांड नहीं फोड़ता. जाति-बिरादरी में विरोध हुआ. झेल गए. कुंवारे लोग तो जल-भुन गए.समाधान के तौर पर शानदार भोज दिया . भाई-बंधुओं के साथ भात में मिल गए अर्थात स्वीकृति मिल गयी. जाति-बाहर नहीं हुए. इस तरह कठिन संघर्ष के बाद धनेसर भाई पति-परमेश्वर बन गए. कनिया धीरे-धीरे गाँव की भाषा सीख गयी और अपने व्यवहार-विचार से सबकी प्यारी बन गयी. जब मैं किशोर वय का हुआ तो कभी-कभी मुझे भी उनसे संवाद करने का सुख मिलता था. वह मुझे बबुआजी कहती थी. मैं देवर जो ठहरा. सचमुच वह दिल का साफ़-सुथरा थी. वह अपने बाबुल का देस भूल गयी. जहाँ तक मुझे याद है,वह कभी अपने मायके नहीं गयी. बच्चे हुए और सुख-दुःख काटते हुए उनका जीवन बीत गया. कोई शिकवा-गिला नहीं.
धनेसर भाई खेती के अलावा पशु-पालन करते थे. रोज शाम भैंस का दूध लेकर मेरे यहाँ आते. मेरे यहाँ नियमित रूप से चाय बनती थी और वे चाय पीकर घर लौटते थे. इस विवाह में उपहार स्वरूप उन्हें एक घड़ी मिली थी. वे उसे नियमित रूप से बांधते थे. कलाई पर बंधी उनकी घड़ी को यह बालक बहुत गौर से देखता था. तब वे घड़ी खोलकर मुझे दे देते. मैं उसे कान में लगाकर उसकी टिक-टिक सुनता था. यह मेरे लिए कौतूहल की वस्तु थी. मैं भी कौतुकी बालक था. घड़ी की सुई को ऐंठता और अपनी इच्छानुसार समय घटा-बढ़ा देता था. घड़ी से समय देखना उन्होंने मुझे सिखाया. कैसे घड़ी की सुई घंटा,मिनट और सेकेण्ड बतलाती है,यह सब सिखलाया. मैं दस मिनट में ही घड़ी की सुई आगे बढ़ाकर आठ या नौ बजा देता था. उन दिनों दिन में आकाश की ओर लोग देखकर समय का अनुमान लगाते थे. समय का ज्ञान नहीं होने से कुछ लोग एक-दो बजे रात में उठकर अपने काम में लग जाते. फिर उन्हें नींद आने लगती तो सो जाते थे. सवेरे उठ कर इस वाकये की चर्चा लोग पड़ोसियों से करते तो सब मिलकर हंसने लगते थे. शुक्रतारा देखकर लोग समझते थे कि भोर हो गया है. यह सब अविश्वसनीय लग सकता है लेकिन सच है.
धनेसर भाई साधारण आदमी थे और किसी तरह घर-गृहस्थी चलाते थे. एक बात उस जमाने में थी कि उस समय कुछ भी स्थायी नहीं होता था-न दोस्ती ,न दुश्मनी. झगड़ा भी किसी से हुआ तो सुलह होने में देर नहीं लगती थी. कालांतर में किसी के बहकावे में धनेसर भाई मेरे दुश्मन के यहाँ आने-जाने लगे. एक बार दुश्मन से मेरा विवाद बढ़ गया और वे उनकी ओर से भाला लेकर खड़े हो गए. न जाने क्या हुआ कि वे भाला को जमीन पर रखकर वहीं बैठ गए. शाम में जब इस बात की जानकारी उनकी पत्नी को मिली,वह बहुत नाराज हुईं. उनके बच्चों का हमारे घर आना-जाना और खाना-पीना जारी रहा. वे मेरे बाल्यावस्था में कहानियां सुनाते जिनमें केवल किस्सागोई ही नहीं होती,अपितु अनुभव और दर्शन भी समाविष्ट होते थे. लोक का अनुभव समृद्धकारी होता है. वे जो कुछ हमें सुनाते थे,उन्हें मैं आज भी याद करता हूँ. कुछ वर्ष पूर्व जब मैं गाँव गया था तो घूमने के लिए निकला. यह मेरी आदत है कि मैं जब गाँव जाता हूँ पड़ोसियों से मिलने जाता हूँ. उनसे मेरा रिश्ता भाई-भौजी,काका-काकी वाला है. अब तो सबके बेटे-पतोहू हैं. इस लिहाज से मैं भी सुर में आ गया हूँ अर्थात ससुर बन गया हूँ. सबसे बात करता हूँ. हालांकि अब पहले वाला माहौल नहीं रहा लेकिन अपनी ओर से पहल करने में मैं नहीं चुकता. कुछ वर्ष पूर्व धनेसर भाई की पत्नी दिवंगत हो गयी थी और वह जीवन की गाड़ी अकेले खींचने लगे. मैं उनसे मिलने गया तो रात के आठ बज चुके थे. वह अपने कमरे में रामचरितमानस पढ़ रहे थे. मैंने सड़क से उनकी आवाज सुनी. मुझे उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं जान पड़ा. मैं लौट गया. उनसे मुलाक़ात नहीं हो सकी और अब होगी भी नहीं. मैं घड़ी की सुई को पीछे लौटने में असमर्थ महसूस कर रहा हूँ. एकाध गलती के लिए किसी को कैसे भुलाया जा सकता है.
