अकविता

मेरे पास ढेर किताबें हैं
उनमें से कई पढ़ी भी नहीं अब तक

मेरे आसपास हैं ऐसी तमाम लड़कियां
जो अपनी मर्ज़ी से खरीद नहीं पाती किताबें
घरवाले ज़ेवर तो दिला देते हैं, किताबें नहीं

मैंने देखी हैं ऐसी स्त्रियां जो रातों से डरती हैं
जिनके साथ हर रात होता है वैवाहिक बलात्कार
मैं ऐसी स्त्रियों को भी जानती हूं
जो खुलकर करती हैं अपनी यौनिकता पर बात
अपनी कामनाओं को लिखती हैं और जीती भी हैं
जिन्हें रत्ती फर्क नहीं पड़ता कौन क्या कह रहा है

ऐसी तमाम लड़कियां जो बाध्य हैं कहीं न कहीं
और ऐसी भी जो सबको धता बता उड़ रही हैं उन्मुक्त
वो तो हिजाब ओढ़े हैं या सिर पर है लंबा घूंघट
या जिनकी टांगें दिख रही है मिनी स्कर्ट से
सीने पर है भारी दुपट्टा
वो जो समंदर किनारे टू पीस में कहकहे लगा रही हैं
या सब्जी का थैला भर धीमे कदमों से लौट रही हैं घर

वो स्त्रियां जो साथी कवि के कंधे पर
धौल जमा कान में फुसफुसाती है कुछ
और लगाती हैं ठहाके
वो जो खुलकर करती हैं चुहल
जिनके आने से आती है रौनक भी और कुछ चेहरों पर तनाव भी
जिनसे डरते हैं कुछ, कुछ करते हैं ईर्ष्या
वो जो अब पीछे की कुर्सियों पर नहीं बैठती
खुद बढ़कर मिलाती हैं हाथ
या वो जिन्हें अब तक मिली ही नहीं कोई कुर्सी
वो जो चाय बनाती हैं
वो जो जाम उठाती हैं

जिनकी चरित्रावली लिखने में मशगूल हैं कुछ लोग
वो जो बाख़बर हैं लेकिन बेपरवाह
जिन्हें फर्क नहीं पड़ता कौन क्या कह रहा है
या फिर वो जो ज़रा सी आहट पर सहम जाती हैं
कोई कोना मिलते ही रोने लगती हैं बेआवाज़
वो भी जो भरे मंच से लगाती हैं हुंकार
और वो भी जिसके मुंह से आवाज़ तक नहीं निकलती

मैं इन्हीं के बीच हूं कहीं
और इनके साथ भी
यही मेरा स्त्री धर्म है…


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