स्त्री

स्त्री ने आसमान निहारा
समंदर तलाशा
पर्वत नापे
गुफाएं खोजी
जंगल छाने
लेकिन उसके लिये
कहीं कोई जगह नहीं थी

स्त्री ने दफ्तर, बाज़ार
रेलवे स्टेशन, अस्पताल
नदी, पुल, दुकानें
गौशाला, तबेला
और सारी सड़कें भी देख ली
लेकिन कहीं भी
कोई जगह नहीं मिली

अपने घर से तो
सदा ही निर्वासित रही स्त्रियां
किसी भी देश ने
स्त्रियों को कभी
स्थायी निवासी का प्रमाण पत्र नहीं दिया
सभी धर्मस्थलों के मूल में बद्ध था
स्त्री नर्क का द्वार है

थककर स्त्री
अपनी कोख में भी झांक आयी
लेकिन वहां भी वो अवांछित ही थी
आखिरकार एक दिन
ये धरती स्त्री विहीन हो गयी

अब सब कविताओं में तलाशते हैं स्त्री
स्त्री किताबों में चैन की नींद सो रही है


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