और नाम भूल जाता हूं 

चेहरे जाने – पहचाने थे 
राह चलते, हाट बाजा़रों, समारोहों में
कई बार मिले हैं 
हालचाल पूछा,
बातें की, ख़ूब की 

हर बार उन चेहरों की हंसी को
याद रख लेता हूं
और नाम भूल जाता हूं

ऐसा कई बार हुआ कि
उनसे बातें करते हुए मैंने 
कई बार नज़रें चुराई
अपनी झेंप मिटाने के लिए
देर तक बातें की,
उलझन में रहता हूं
इतने जाने – पहचाने से हैं फिर क्यों?
हर बार नाम भूल जाता हूं

भीड़ में कहीं दूर से दिखाई दें
तो क्या कहकर आवाज़ दूं?
इसी उपापोह में रहता हूं 
अपने भूलने की इस आदत से
इस कदर परेशान हूं कि
अब अपना नाम भी भूल जाता हूं। 
सोचता हूं कि 
कैसे इन आत्मीय रिश्तों की 
गरमाहट को बचाकर रखें?


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