“और बता भाई”
“बस सब बढ़िया”
ऐसे बात करते थे पुरुष
जैसे बात छुपा रहे हों
कोई भावुक होकर रख देता अपना दुःख
तो खींच ली जाती उसकी टांग
या छिड़ जाती स्पर्धा पुरुषों के बीच
अपना दुःख बड़ा बताने की
फिर सबने मिलकर तय किया—
दुःख छुपाना ही अच्छा
भले एक दिन ख़ुद को गोली मार लें
और इस तरह विषय बने
राजनीति खेलकूद और भाषा
ये वस्तुएँ थीं जिनमें स्पर्धा संभव थी
उनका सबसे बड़ा दुःख स्त्री थी
उन्होंने स्त्री को भी छुपाया दुःख की तरह
स्त्री के अंग–प्रत्यंग भाव–भंगिमा
सब को वस्तु में बदला
और इस तरह पुरुष के दुःख से
क्रोध ने जन्म लिया
इधर स्त्रियाँ खुलकर बतियाती थीं अपना दुःख
डबडबाई आँखों से सुनती थीं एक दूसरे की बात
जैसे सबकुछ अपने साथ घट रहा हो
और भर जातीं इतनी संवेदना से
कि तिलचट्टे से डर जातीं
मानों उनकी देह पर चल रहा हो
पुरुष ने आकर कुचल दिया तिलचट्टा
निकल गया थोड़ा सा क्रोध
मज्जा की तरह
स्त्री और पुरुष
अपनी–अपनी भाषा में कुछ बोले
इससे दुःख थोड़ा कम हुआ
लेकिन इतनी अलग थी उनकी भाषा
कि वे बिलकुल नहीं समझ पाए
एक दूसरे की बात
फिर उन्हें एक दूसरे की गंध लगी
और प्यास जगी
और साथ रहे
और बच्चे जने
और बच्चे बने
पुरुष ने गुनगुनाया कोई गाना
स्त्री उसकी धुन पकड़कर
गाने लगी कुछ और।
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