चिकनाई आजकल उतनी मँहगी नहीं
जितना मँहगा है रूखापन
सस्तेपन की कभी कोई कसौटी नहीं बनाई गई
किसी के गिरने का कभी कोई स्तर नहीं होता
हाँ, उठने का स्तर जरूर होता है
लेकिन वह व्यक्ति- सापेक्ष है
हम भाषा में उठते-गिरते हैं
‘भाषा’ कोई ख़ैरात में मिली संपत्ति नहीं
एक जिम्मेदारी का नाम है- ‘भाषा’
आप जितना जिम्मेदार बनोगे
भाषा उतनी उठती चली जायेगी
क्योंकि भाषा नहीं गिरती
हम भाषा में गिरते हैं
चिकनाहट और सुघड़ता
वर्तमान दुनिया के लिए काम्य है
इसलिए इसकी माँग सर्वाधिक है
लेकिन अर्थशास्त्र के नियम के विपरीत
पूर्ति भी सर्वाधिक है
कुछ भी पाने के लिए
कुछ भी किया जा सकता है
और कुछ भी करने के लिए
सब कुछ दाँव पर लगाया जा सकता है
जीवन जीने की गारंटी संविधान की किताब में बंद है
जिसे खोलने का मतलब है- उठने की स्तरीयता
‘देह’ स्खलन का चरमबिन्दू
सब कुछ एक स्त्री- देह के इर्द-गिर्द घूमता
स्त्री का अकेलापन एक अवसर
गिरने की पराकाष्ठा सर्वाधिक है
मनोविज्ञान ने मस्तिष्क को ‘काम’ के समक्ष जड़ माना
चेतना शून्य और अचेतन का विस्तार
तर्क, मान-मर्यादा, सभ्यता-संस्कृति अपने गिरने के आख़िरी छोर पर उपस्थित होते हैं
और कपड़े की छोटाई गिरावट को शत प्रतिशत दर्ज करती है
‘देह’ ने समाज को उठने नहीं दिया
और स्त्री ‘देह’ के अत्यंत उच्च शिखर पर उपस्थित है
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