सुन नहीं रहे हैं बच्चे!
बहरे हैं शायद…
या फिर आलसी…
वे हमें सुनना ही नहीं चाहते,
बड़े उकताए हुए हैं
इसलिए फ़ोन देख रहे हैं
जवाब ढूँढ रहे हैं बच्चे
जो उन्हें मिले ही नहीं हमसे
रील बना रहे हैं बच्चे
होड़ कर रहे हैं बच्चे
मूल्यों को ढूंढ रहे हैं बच्चे
सब देख रहे हैं बच्चे
बड़े हो गये हैं बच्चे
चुप रहते हैं बच्चे
टूट रहे हैं बच्चे
जिद्दी हैं बच्चे
अपराधी हैं बच्चे
आह! सुन नहीं रहे हैं बच्चे
नहीं सुनने वाले बच्चे;
सवाल उठा रहे हैं
किताबों से करतूतों तक-
वे सब जान गये हैं
वे जवाब माँग रहे हैं
वे तकनीक की दुनिया के बादशाह हैं
उन्हें व्यवस्था से डर नहीं लगता
हम उन्हें ‘जिद्दी पीढ़ी’ कहकर चिंतित हो रहे हैं
और वे-
एक नई दुनिया का भाष्य लिख रहे हैं…
इसलिए सुन नहीं रहे हैं बच्चे
इसलिए चुप थे बच्चे
0 प्रतिक्रियाएँ
