कई बार मर रहा हूँ

जब मैं थोड़े से प्रेम के लिए
तड़प रहा हूँ, प्यारे बसंत
मुझे ओस भींगे गुलाब से
मत बहलाओ

मैं अपने आकाओं के
वासनामय गंदगी को ढो रहा हूँ
उसके सभी बदनामियों को
अपने अंतर में पो रहा हूँ
उसका तिरस्कार,
उसके कर्मों की सड़ांध से
अपनी झोली भर रहा हूँ
एक दिन जीकर कई बार मर रहा हूँ

प्रिय पुरवाई हवा
मेरे लिए बजबजाती दुर्गंध ले आओ
मेरे लिए अमंगल कुतर्क का
रहस्यमय गीत गाओ
मैं असहाय, बेचारगी के विकृत होठों पर
अस्फुट सा धीरे-धीरे फुसफुसाउंगा।


4.7 3 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x
0

Subtotal