लौटना

जैसे दिनभर का थका सूरज
शाम को लौट जाता है क्षितिज में
जैसे आकाश के विस्तृत आँगन में
असंख्य तारे लौट आते हैं
पृथ्वी को अपनी टिमटिमाती मुस्कान सौंपने

वैसे ही मेरे स्वप्न
मेरे स्मृति के उँजाले में लौटना
एक संगीतमय ध्वनि के साथ

जैसे सागर लौटती है
मेघों से होकर वारिश की बूँदों में
जैसे हवा की नमी छुकर
लौट आती है नदी की शीतलता
वैसे ही एक दिन लौटना

लौटना बचपन की मासूमियत
उम्र के ढलान पर
वृद्ध के मुस्कान पर
जैसे मौके की तलाश में
किसी निर्जन खंडहर में छिपी
तमाम चुप्पियों में पनाह लेती हिंसा
वापसी के लिए तत्पर रहती है

तुम्हारे भीतर मृत्यु का सन्नाटा है
वर्तमान की पीड़ा का भय
छायाओं जैसा बढ़ता है अफ़सोस
तुम्हारे देह पर
अधखिले पुष्प झरते हैं


4.7 3 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x