लड़की

लड़की रस्सी है
पिता को फांसी के फंदे सी नज़र आती है

लड़की ज़हर है
माँ रोज़ पीती है कड़वा घूँट

लड़की छुरी है
भाई की उंगली कट जाती है तेज़ धार से

लड़की श्राप है
सर्दियों में आई दादी कोसती है हर साल

लड़की शक है
पड़ोसी की निगाहें टटोलती है सुबह-शाम

लड़की नमक है
मोहल्ले के लड़के महसूस करते हैं जीभ पर

लड़की नशा है
सहपाठी की आँखों में उतर आती है खुमारी

लड़की चिड़िया है
बुआ कहती है बहुत उड़ने लगी है आजकल

लड़की सोचती है
किसी दिन वो लड़की होकर देखेगी दुनिया


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