स्मृतियाँ

अतीत की स्मृतियों की चुभन
नंगे पैरों में
कांटे की तरह चुभता है
कुछ धुमील सी यादें
बीते दिनों की राख होती है

अतीत का शोक गीत
महामारी की तरह फैलता है
और पूरे प्रदेश को
लीप देता है
अपनी तीखी बजबज़ाती लिपि में

कुछ स्मृतियाँ महज पीड़ा ही नहीं देती
हमे खंघालती, संभालती भी हैं
और सपनों में गूँज उठता है
पिता का बेसुरा राग
जिनके अनुशासन में
मेरा प्रत्येक कुचेष्ठा हारा है

स्मृतियों मे मेरी माँ
रुलाती नहीं बल्कि
मीठी लोरी सुनाती है
और इधर घोसलों से निकल
गोरैया फुदकने लगती है
मन चहकने लगता हैं।


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1 प्रतिक्रिया
Sanjay Borude
Sanjay Borude

दहकते शोलों में चलने की चुभन कविता की अंत में आयी माँ की लोरी मीठी बना देती है और जख्मों को अजीब सा सुकून मिलता है । अतीत के जख्मों पर मरहम का करती है माँ की लोरी । सुरेन्द्र जी बड़ी बारिकियों के साथ इन परतों को खोलते है ।

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