मूर्ख पौन्ड्रक उर्फ नॉन बायोलॉजिकल एडवेंचर

‘मै हूँ असली वासुदेव’
हीही – खीखी करते हुए राजा पौन्ड्रक ने
सिंहासन के हत्थे पर मारा दोहथ्थड़
मुनादी कर दो सारे राज्य में
               संदेश भिजवा दो सभी राजाओं को….
हरकारे दौड़ पड़े सभी दिशाओं में
नन्ही नन्ही पताकाओं पर गरुड़ चिन्ह
हाथों में खिलौने का सैंगोल लिए…
साधु
  दरबार में झाड़ू लगाने लगे
अपनी दाढ़ियों से
दरबारी पछाड़ खाकर रोने लगे
               श्रद्धा से घिग्घी बंध गई प्रजा की
अंतिम सत्य की आकाशवाणी सुन
                न्यूज़ रूम में नारद ने
                तानपुरे का तुंबा तोड़ दिया…
‘वासुदेव ने अवतार लिया है’
                 कहकर एक नगर श्रेष्ठि ने
                 दूसरे नगर श्रेष्ठि को आँख मारी
काशी और गांधार के राजाओं ने
               समर्थन पत्र भेजे
               राजदूत के हाथ और
     विश्वगुरु की उपाधि लेने की खातिर
     अपने राज्य में आने का न्योता दिया
काशी और गांधार के राजाओं ने
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बात की और कहा
‘वासुदेव ने अवतार लिया है !’
              ये कह कर
          काशी और गांधार के राजाओं ने
         एक दूसरे को आँख मारी …
         और पुण्ड्र प्रदेश का टैरिफ बढ़ा दिया

पौन्ड्रक ने धारण किये
वासुदेव के चिन्ह
उसने धारण किए गत्ते के चार हाथ
तेज़ हवा चलने पर थरथराते-कांपते
             दोहरे हुए जाते
           गत्ते के चार हाथ ….
          साक्षात वासुदेव
प्रधान न्यायाधीश ने कहा-
मेरी अन्तरात्मा कहती है – यही
यही
असली वासुदेव हैं
संविधान की शपथ
राज्यसभा की सौगंध
साक्षात वासुदेव!

एक हाथ में धारण किया उसने शंख-ढपोर शंख
जिसमें ध्वनि नहीं शोर था
जिसमें कायरता भरी चुप्पी थी
जिसमें आवाहन नहीं
एक लिजलिजी
कामुक
क्रुरूता थी…

दूसरे हाथ में धारण किया उसने
लकड़ी का सुदर्शन चक्र
जिस पर रोज़ होता सुनहरा पेन्ट
सुनहरे पेन्ट पर चिपकी हुई
सुस्ताती थी मक्खियाॅं
चक्र से बस भयभीत होते प्रजाजन
दुश्मन के सामने
चक्र बेचारा चक्कर खाना भूल जाता
ब्लडी काॅम्प्रोमाइज़्ड चक्र

तीसरे हाथ में धारण की उसने थर्मोकोल की गदा
जिस पर मढ़ी थीं सुनहरी पन्नियाॅं
जो स्टेज पर
ऐन शो के वक्त उचड़ जाती थीं
दर्शक बेसाख़्ता हॅंसते और
फिर डर से सिहर जाते…
शयन के वक़्त
गदा की सुरक्षा के लिए प्रहरियों की टीम थी
जो प्रजा से
गदा टैक्स वसूल करती__
चौथे…

चौथे में था कमल
कागज़ का कमल
रस-गंध हीन
कागज़ का कमल
ऊबा हुआ
क्रोधित
और खिसियाआ हुआ
कागज़ का कमल
सिंहासन के पाये पर एक बटन था
जिसके दबाने पर खिलता था कमल…रक्त कमल
और कमल‌ के खिलने पर
पूरे राज्य में एक तीखी चिरायंध फैल जाती…
न कमल लोचन
न कर कमल
न पद कमल
न हृदय कमल
बस
नरभक्षी निर्देशों का संकेताक्षर
मूर्ख पौन्ड्रक का
कमीना कमल!

उसने बनवाई इस्पात की बाॅंसुरी
जिसमें निकलते,1800 डिग्री सेंटीग्रेड के लावे के सुर
तान छेड़ता जब भी; पौन्ड्रक
पुण्ड्र में फैलता लावा
लावे‌ में कोयला हुए लोग
मरते दम तक गाते पौन्ड्रक वासुदेव के भजन
जो बच जाते परिजनों का कोयला जला
पौन्ड्रक प्रसाद बनाते।

पौन्ड्रक ने धरा पीताम्बर
और नागरिकों के सोना खरीदने पर लगा दी‌ पाबंदी

पौन्ड्रक ने अपने बाथ टब को कहा कालिंदी
पौन्ड्रक ने‌ अपने भाई को कहा सुदामा
पौन्ड्रक अपनी
रखैलों को गोपियाॅं कहने लगा
पौन्ड्रक ने कौस्तुभ मणि के लिए
अलकापुरी के ज्वेलर्स को दिया टेंडर और
हद तो तब हुई
जब उसने
प्लास्टिक का मोरपंख लगाया और
चिल्लाया अपनी बूढ़ी आवाज़ में
‘मैं ही हूॅ़ं असली वासुदेव’
नगर श्रेष्ठियों ने एक दूसरे को आँख मारी
काशी और गांधार के राजा मुस्कुराये
और सिंहासनों पर करवटें बदलीं
कृष्ण को तरस आया
पुण्ड्र की जनता पर…
पुण्ड्र की जनता ने
समवेत्
सस्वर गाया
ओऽम नमो भगवते वासुदेवाय


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