सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट 

हम इस सदी के सबसे ख़तरनाक दौर से-
गुजर रहे हैं… 
याकि प्रत्येक दौर ही 
इस प्राकृतिक प्रायोगिक सत्य के साथ खड़ा होता है-
कि ‘जो सर्वाधिक योग्य होगा उसके उत्तरजीवी होने की संभावनाएँ सर्वाधिक होंगी’
यह डार्विन का मात्र विकासवादी सिद्धांत नहीं था 
जिसे हरबर्ट स्पेंसर द्वारा एक शब्द दिया गया था 
बल्कि स्थापित होने की आकांक्षा और अंधी प्रतियोगिता का वह गह्वर था जिसे कभी पाटा नहीं जा सका…

प्रतियोगिता! प्रतियोगिता! प्रतियोगिता!
दौड़ो, रौंदो, मार डालो
क्योंकि हमारे जीवित रहने के लिए यह जरूरी है!
सत्य की करो हत्या 
नहीं तो वह हमें रौंद देगा
इसलिए झूठ इतना बोलो कि
सत्य को पहचानने की गुंजाइश भी ना बचे
नक़ल करने को मानक बना दो
कि चहुँओर नकली लोग कुकुरमुत्ते की तरह उग आयें 
याद रखो, तुम्हें बचना है- 
तो यह प्रतियोगिता जीतनी होगी!

इतिहास साक्षी रहा है- 
‘योग्यतम की उत्तरजीविता का’
इसलिए साबित करो कि तुम योग्य हो
बनाओ बारूद, गोले और परमाणु बम
और गिरा दो किसी लाचार कमज़ोर पर
कि उसके उगने और उठने की संभावनाएँ तक खत्म हो जायें!

जानते हो-
तुम्हें डरना चाहिए स्त्रियों से
क्योंकि वे तुम्हारी उत्तरजीविता पर सबसे बड़ी प्रश्नवाचक चिह्न की तरह हैं
वे बिना खाद-पानी के उगती हैं 
और अंधेरे से पोषण प्राप्त करती हैं 
इसलिए उनके शरीर को रणक्षेत्र बना दो
और इतनी बार रौंदो कि वे मात्र जिंदा लाश के अतिरिक्त कुछ ना हो
फिर उन्हें सावधानी से ज़मीन से कई-कई फ़ीट नीचे दफ्ना दो
ताकि उन्हें उगने और उठने में सदियों की यात्रा तय करनी पड़े
और तब तुम देखना-
इस सदी की इस शक्ति की लड़ाई में तुम जीत जाओगे!

सुनो!
तुम ऐसी दुनिया गढ़ना
जहाँ आज़ादी माँगने पर मौत दी जाती है
तुम चोर, बदमाश और गुंडों के हाथों 
सौंप देना शासन का बागडोर
नहीं तो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करने वाले
साबित कर देंगे अपनी योग्यता 
और दुनिया के विकास की दिशा बदल जायेगी 
जो तुम्हारी उत्तरजीविता को कटघरे में खड़ी कर देगी
इसलिए तुम थोड़ा स्वार्थी बनो!
क्योंकि तुम्हें अपने होने को बचाना है-
‘येन-केन-प्रकारेण’ जिस तरह बन पड़े 
तुम्हें याद है?
एक बार याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा था-
‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति’
इसलिए भूल जाओ सारी नैतिकता 
और मनुष्यता को रख दो एक तरफ 
बस इतना याद रखो तुम्हें जीतना है…

इस धरती पर सदियों से
योग्यतम की उत्तरजीविता की लड़ाई चलती रही 
और शक्ति पाने और एक जगह केन्द्रित करने को
सबसे महान कार्य माना गया 
इसलिए तमाम बुराईयों को जो मनुष्य और जीव-जंतुओं के ख़िलाफ़ थे-
पुष्पित और पल्लवित किया गया तथा आगे की पीढ़ियों को सौंप दिया गया 
बिना यह सोचे कि अंधी प्रतियोगिता केवल आलस्य, ईर्ष्या और हिंसा को जन्म देती है
जिसमें किसी का भी साबुत बच पाना कठिन है…
इसलिए वास्तविक योग्यता को बचाना होगा 
जिसकी उत्तरजीविता दुनिया के प्रेम पर टिकी है!


3.5 2 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x