रोगों के बीच जीती स्त्रियां

घर के पोर-पोर में रची-बसी स्त्रियों के
पोर-पोर से दर्द की एक नदी बहती है
दर्द की यह शांत नदी अचानक उफनती है
और ‘आह’ की ध्वनि से घर कंपायमान हो जाता है!

जोड़ों का दर्द असमय शुरू हो जाता है
कमर का दर्द जाने का नाम नहीं लेता 
माहवारी कभी भी समय पर नहीं आती 
सफ़ेद पानी दिनचर्या बन जाती है
चेहरा सूर्ख़ पीला होने लगता है
खून की कमी सामान्य बात होती है
हड्डियां भयानक दर्द से गुजरती हैं 
मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं 
थकान जीवन का हिस्सा बन जाता है
घर के पोर-पोर में रची-बसी स्त्रियों को पता है
कि यह सब कोई रोग नहीं बल्कि सामान्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा है

इसलिए-
उन्हें जैसे ही अपने बीमार होने का संदेह होता है
वे सभी घरेलू नुस्खे अपनाती हैं 
और योगासन करती हैं 
वे मानती हैं कि पर्यावरण अब अनुकूल नहीं 
इसलिए कई बार शरीर तेज ज्वर में हहराने लगता है
लेकिन घर की जिम्मेदारियों के बीच वह हमेशा खुद को भूली रहती हैं 
जैसे कोई जानबूझकर दवा लेना भूल जाता है!


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