अतीत की स्मृतियों की चुभन
नंगे पैरों में
कांटे की तरह चुभता है
कुछ धुमील सी यादें
बीते दिनों की राख होती है
अतीत का शोक गीत
महामारी की तरह फैलता है
और पूरे प्रदेश को
लीप देता है
अपनी तीखी बजबज़ाती लिपि में
कुछ स्मृतियाँ महज पीड़ा ही नहीं देती
हमे खंघालती, संभालती भी हैं
और सपनों में गूँज उठता है
पिता का बेसुरा राग
जिनके अनुशासन में
मेरा प्रत्येक कुचेष्ठा हारा है
स्मृतियों मे मेरी माँ
रुलाती नहीं बल्कि
मीठी लोरी सुनाती है
और इधर घोसलों से निकल
गोरैया फुदकने लगती है
मन चहकने लगता हैं।
संबंधित विषय – स्मृति

दहकते शोलों में चलने की चुभन कविता की अंत में आयी माँ की लोरी मीठी बना देती है और जख्मों को अजीब सा सुकून मिलता है । अतीत के जख्मों पर मरहम का करती है माँ की लोरी । सुरेन्द्र जी बड़ी बारिकियों के साथ इन परतों को खोलते है ।