स्त्री की जगह

जब तक वह ठीक रही 
पूरा घर घूमता रहा आसपास
सबकी जरूरत वह थी
उसके बिना न दिन होता था न रात आती थी
वह डिबिया जलाकर सांझ दिखाती तो
रात आती थी दबे पांव
खिड़की के पल्ले खोलती तो 
दौड़ती सुबह कमरे में

वह स्त्री पूरे घर के लिए आसमान थी
बारिश थी सावन के महीने की
हवा थी वसंत की सुबह वाली
धूप थी जाड़े के दिन वाली
पानी थी पहाड़ी नदी की मिठास लिए
नमी थी मिट्टी में घुली सनी
स्त्री वह सबकुछ थी जिसकी नींव पर
खड़ा हो रहा था घर
घर संभल रहा था अपने पांव पर

घर उसकी पीठ पर खड़ा हो रहा था और
वह झुकती जा रही थी
जैसे कोई टहनी झुक जाती है एक समय के बाद
वह झुकती जा रही थी
झुकती जा रही थी लगातार
फिर एक दिन पूरी तरह झुक गई
इतना कि उठने लायक ताकत नहीं बची

जब पता चला कि वह बीमार पड़ गई
किसी काम की नहीं रही
तब वही स्त्री एक बोझ बन गई
जिसे हर कोई उतार देना चाहता था 
अपने कंधे से
वह भारी लग रही थी
वह बहुत भारी लग रही थी 

वह स्त्री अपनी जगह खोजती रही उस घर में
लेकिन बित्ते भर भी नहीं मिली जगह हिस्से में कहीं
वह बरामदे पर पड़ी रहती थी
अकेले रोती
अकेले कलपती
अपने आंसू पोंछती या
छोड़ देती समय के साथ सूख जाने के लिए

बीमारी बढ़ती गई
शोक बढ़ता गया
आंसू बहते गए
तकलीफ बढ़ती गई
दवा बेअसर हो गई यह सोचकर कि
जिसे उसने पाल पोस कर बड़ा किया
वही घिन करता है अब उससे

जब बिस्तर से उठ नहीं पाती
मैले से लिथड़ी पड़ी रहती कई कई दिन
लेकिन कोई पलटकर देखने नहीं आता
पूरा घर महकता
पूरा आंगन बदबू देता
 
वह तो कभी घिन नहीं कर सकी अपने बच्चों से
खाते समय भी दौड़ पड़ती थी 
भरी थाली छोड़ कर
बच्चों के पास
आज वही बच्चे देखते तक नहीं कि
वह कितनी तकलीफ़ में कराह रही

समय बीतता गया
शोक बढ़ता गया
तकलीफ़ बढ़ती गई
फिर एक दिन वह 
विदा हो गई इस दुनिया से चुपचाप
किसी को खबर भी नहीं हुई कि
कब छूटे प्राण
पूरा परिवार था घर के भीतर
स्त्री थी घर के बाहर 

जिस घर को बनाया उस स्त्री ने
उसके बाहर निकले उसके प्राण
मरते समय भी नसीब नहीं हुआ घर


3.5 2 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x