जली हुई रोटी की स्याह रातों के पहले
धूप की उखड़ी हुई सांस
पृथ्वी पर पानी मांगती है
दिन भर का उजास थक जाता है
परास्त हो जाती हैं किरणें
जो अंधेरे से मुठभेड़ करने के लिए
तैयार रहती हैं हरदम
हर चीज की एक उम्र होती है
एक मोहलत मांगती है जड़ें
उन्हें मालूम है कि बंजर जिद
पृथ्वी पर सर उठाने के लिए बेचैन है
सबको फैलना है घास की तरह
सबको चाहिए समूची पृथ्वी
शाम के धुंधलके में
ठहर जाती हैं चीजें एक पल के लिए
एक पल के लिए
सबका चेहरा धुंधला हो जाता है
पेड़ और काले हो जाते हैं
पत्तियां और उदास
रात की गोद में
फूलों का तो कुछ पता नहीं चलता
अगर उसकी गंध न फैले तो
पता भी न चले टहनियों के हिलने पर
लेकिन सब बच जाते हैं
जो दिन में खतरों में भयभीत रहे
वे भी चैन की सांस लेते हैं सारी रात
जैसे पक्षी समेट लेते हैं अपने पंख
शाम के धुंधलके में
उम्मीद का तारा रखवाली करता
टिमटिमाता है समूचा आसमान
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