जब किसी ने नहीं सुनी आवाज़
आके मुझमें ही खो गयी आवाज़
लोग जब मुझसे हो गए रुख़्सत
मैंने बेदारियों को दी आवाज़
घर की घड़ियां ख़राब कर दी हैं
मुझको खलती है वक़्त की आवाज़
दश्त को छोड़ उड़ गए ताइर
पेड़ देते रहे कई आवाज़
फिर से कूदा है कोई दरिया में
फिर से आई है झम्म की आवाज़
कुछ दुखों का क़याम है मुझमें
इसलिए है दबी दबी आवाज़
