(राहुल सांकृत्यायन की रचना वोल्गा से गंगा पढ़ते हुए)
कहीं हिम और अग्नि के संगम पर
नदियों की जंगली सरसराहट के बीच
मानव अभी ‘शब्द’ नहीं जानता था
पर उसकी आँखें बोलना सीख चुकी थीं
‘अरा’ जो पहाड़ की गुफा में
पत्थरों पर आकृतियाँ बनाती थी
हिरण, पेड़, सूरज — और एक आकृति
जिसे देखकर उसकी सहेलियाँ मुस्कुरातीं
वह आकृति ‘एक पुरुष’ की थी
जिसकी आँखें आँधी से भी गहरी थीं
‘नार’ जो
शिकार से लौटता था
रक्त सने भाले और भीगी साँसों के साथ
पर एक दिन जब उसने देखा
अरा की हथेलियों में लाल मिट्टी का रंग
तो उसके भीतर कोई शिकार नहीं
कोई प्रेम जन्मा था।
वे दोनों भाषा नहीं जानते थे
पर मौन के बीच
अरा की उंगलियाँ पत्थर पर चलतीं
और नार उसकी रेखाओं के अर्थ खोजता।
एक दिन उसने
अरा के बनाए चित्र के नीचे
अपने हाथ का निशान रखा —
वह प्रेम की पहली ‘लिपि’ थी
ऋतुएँ बीतीं —
वनों में धुएँ की गंध थी
नदी में चाँद के टुकड़े
अरा ने मिट्टी से
दो आकृतियाँ गढ़ीं
एक उसकी, एक नार की
वे दोनों अब एक नई कथा के प्रतीक थे
मानवता की पहली कथा —
“साथ होने की इच्छा।”
और जब बिजली ने
पहली बार
आकाश को चीरकर पृथ्वी को आलोकित किया,
तो उस क्षण
उनके शरीरों की छाया
एक-दूसरे में विलीन हो गई।
कहते हैं
उसी दिन से
मनुष्य ने
प्रेम को महसूस किया
और इतिहास ने
सभ्यता का नाम पाया।
आदिम स्पर्श
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