शहर के मुहाने पर बहती रही एक नदी
या नदी के मुहाने पर बसता रहा शहर—
इतिहास इस सवाल पर अक्सर चुप रहता है
बस इतना दर्ज है कि जहाँ पानी था
वहीं पहली आग जली
वहीं सिकी पहली रोटी
नदी के किनारे
लोगों ने अपने डर उतारे
अपने सपनों को मिट्टी में बोया
और धीरे-धीरे
एक बस्ती
शहर बनती चली गई
पानी के पास
मनुष्य थोड़ा कम अकेला था
लहरें सुनती थीं
उसकी थकान
और चाँद
हर रात
नदी की पीठ पर
अपनी चुप्पी रख देता था
फिर समय बदला; नदी के ऊपर पुल बने
किनारों पर दीवारें उठीं
और शहर
अपने ही शोर में
नदी की आवाज़ भूलता गया
लेकिन हर बरसात में
जब पानी बढ़ता है
तो नदी
धीरे से दिलाती है—याद;
कि शहर
उसके बाद में आया है
और सभ्यता की जड़ में
अब भी बहता हुआ जल है
शायद इसलिए हमारी रगों में
अब भी जल-तरंगों की हल्की-सी गूँज है—
जैसे किसी बहुत पुराने समय से
एक नदी हमारे भीतर बह रही हो।
नदी
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