दार्जिलिंग त्रयी

(प्रकृति, समय और आत्मा के मिलन की काव्यात्मक यात्रा-वृतांत)

1 . दार्जिलिंग की शाम

धुंध की मुलायम चादर
पहाड़ों के कंधों पर उतर आई है
मानो किसी चित्रकार ने
नीले और सफ़ेद रंगों से
 साँझ को रेशमी बना दिया हो

बादलों के बीच
सूरज की आख़िरी किरण
एक सुनहरा धागा है —
जो क्षितिज की किनारी पर
धीरे-धीरे खुलता जा रहा है

देवदारों की शाखाओं से
ठंडी हवा का संगीत बहता है
हर पत्ती मानो बाँसुरी की कोई तान हो
जो आत्मा को धीरे से छू जाती है।

चाय के बागानों की ढलानों पर
औरतें थकान को मुस्कान में बाँधती हैं
उनके झोले में
केवल पत्तियाँ नहीं
धरती की सुगंध भी होती है

कहीं दूर —
टॉय ट्रेन की सीटी
सांझ के सन्नाटे को चीरती है
जैसे समय ने
अपने गुज़रने का इशारा किया हो

दार्जिलिंग की यह शाम
देखने से ज़्यादा महसूस होती है —
यह हवा में घुला एक गीत है,
जो आँखें बंद करते ही
मन के भीतर बज उठता है।

2. दार्जिलिंग की रात


रात उतरती है —
मानो किसी साध्वी ने काले आँचल से
आकाश को ढँक लिया हो
तारों की झिलमिल रोशनी

धुंध के आँचल में
धीरे-धीरे गलती है
और चाँद —
एक मौन दीपक की तरह
आसमान के कोने में जलता है

पर्वतों की छाया
अब निस्तब्ध है
उनके भीतर
जैसे कोई 
प्राचीन ध्यान चल रहा हो

टॉय ट्रेन की पटरियाँ
ठंडी धातु की नसों-सी चमकती हैं,
उन पर सोया हुआ समय
धीरे से करवट लेता है

चाय के बागान
अब अंधकार में डूबे हैं
पर हर झाड़ी के भीतर
ओस की एक आँख
चमकती है —
मानो धरती भी
सपने देख रही हो

दार्जिलिंग की यह रात —
निशब्द कविता है
जहाँ शब्द नहीं
सुनना ही अर्थ है।

3. दार्जिलिंग की सुबह

पहाड़ों की गोद से
धुंध धीरे-धीरे उठती है —
मानो रात्रि का स्वप्न
प्रकाश में घुल रहा हो

आकाश अब नीले का नया अर्थ बन गया है
और सूरज —
जैसे किसी कलाकार ने
स्वर्णिम रंग से दिन का द्वार खोला हो
पत्तों पर ओस की बूँदें
कविता के अक्षरों-सी चमकती हैं
हर बूँद में
आकाश का छोटा-सा 
प्रतिबिंब थरथराता है

चाय बागानों से आती है
पहली तोड़ी की महक —
धरती की नमी
मेहनत की गंध और जीवन की मिठास का संगम

टॉय ट्रेन की सीटी
फिर से एक नई यात्रा का संकेत देती है
जैसे समय ने
अपना हृदय 
फिर से खोल दिया हो।

दार्जिलिंग की यह सुबह
सिर्फ प्रकृति नहीं —
आत्मा का पुनर्जन्म है।


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