वो हर बार की तरह
ऑंखें झुका लेते
नज़रें फेरकर चले जाने वाले
बगल से निकलते ही कन्नी कटा लेते
सामने से मिलने पर
गले मिलते हैं, हाथ जोड़ते हैं
खैरियत पूछते
बरसों के बिछड़े साथी कुंभ के मेले में मिलकर
नस नस तक फड़क उठा हो
किसी को अंदाजा न था
ये मेल चुल्लू भर पानी में डूब मरने की तैयारी है
गंगा में स्नान करके शायद
मन का मैल धुल लेते तो अच्छा होता
लेकिन क्या पता था
मन में जहर घोलने वालों की भला ज़बाँ कब कड़वी होती?
जहर पोर- पोर फैलता
शिरा-शिरा, नस-नस तक
वो खुद ही तिल-तिल कर मरने लगते
खुद ही खुद के हत्यारा बनते
अपने ही हाथों कुत्ते की मौत मरना पसंद करते
उन्हें पता है बातों की चाशनी में
असलियत तो न घुल सकेगी उनकी
संबंधित विषय – अकेलापन
