हम तब भी लड़ते थे
जब वनों की नमी में
हमारे पाँवों के निशान
इतिहास की पहली लिपि लिख रहे थे
पत्थर हमारे हथियार थे
भय हमारा धर्म
और आग—
सभ्यता का पहला सपना
फिर समय ने पहिया बनाया,
नगर उठे, साम्राज्य बने,ग्रंथों ने बुद्धि को स्वर दिया
पर मनुष्य का क्रोध
अब भी आदिम ही रहा
हमने पृथ्वी की सीमाएँ लाँघीं,आकाश को नापा,
तारों की दूरी गिनी, ग्रहों तक अपने स्वप्न भेजे
और विज्ञान की रोशनी में मंगल तक पहुँचने की राह बना ली
इतिहास की मोटी किताब में सभ्यता के अध्याय बहुत हैं
उसमें ज्ञान, कला, करुणा—सबके उजले अध्याय हैं;
पर हर अध्याय के हाशिये पर
रक्त की एक पतली रेखा भी चलती है
आश्चर्य है कि इतिहास के इतने पन्नों के बाद भी
मनुष्य का हृदय अब भी युद्ध की भाषा जानता है।
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