सड़क पर

जो चमचमाती सड़क है उस पर
पहियों की चमक घिसती है
एक के पीछे भागते दूसरे पहिए के बीच
इतनी रफ्तार है कि
कुछ पता नहीं चलता चीख का

क्या कुचला गया चुपचाप
यह कोई देखना नहीं चाहता
चींटियां तो पंक्तियों में मरती हैं
कीड़ों के झुंड कुचले जाते हैं एक साथ
कभी गिलहरी दबती है
कभी मैना जो सड़क पार कर रही थी 
फुदकती हुई

कुत्ते गीदड़ और सांप तो
हर मोड़ पर मिलते हैं कुचले हुए
उनके बच्चे नहीं जानते
पहियों के दांत कितने नुकीले होते हैं
जो आते हैं उस रफ्तार के रास्ते में
वे कुचले जाते हैं चुपचाप
कुछ दिनों तक उनकी चपटी देह दिखती है
फिर सूख कर उड़ जाती है 
उन्हीं पहियों के चलने की दिशा में

सड़क पर सिर्फ रफ्तार नहीं होती
उसकी ओट में देखो तो पता चलता है
न जाने कितने स्वप्न कुचले गए
न जाने कितने पंख टूट गए
न जाने कितनी जिंदगी
बिना किसी अपराध के कुचली गई 

अलकतरो से चिपक कर मिट गई देह
जबकि उनका कोई गुनाह नहीं था
वे तो बस सड़क के इस पार से
पहुंचना चाहती थी उस पार
दानों की खोज में 
अपनी भूख मिटाने के लिए

वह भी जीते जी हासिल नहीं हुआ


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