इक सदा देता है कोई नींद के उस पार से
आँख खुल जाती है मेरी दस्तक ए अग़्यार से
मैं समझता था वो मेरा ख़ून कर डालेगा पर
डर रहा हूँ बात करता है वो बेहद प्यार से
जिस तरह से वो मिरे माज़ी में शामिल हो गया
वक्त पीछे रह गया है उसकी ख़ुश रफ़्तार से
गर मुहब्बत ना रही तो ना सही पर दरमियां
दोस्ती तो बच गयी है इक नई दीवार से
दुख की लहरों से बचाकर ला रहा है जो मुझे
नाव सा उसका बदन है हाथ हैं पतवार से
